भूतिया घर – सच्ची घटना पर आधारित एक डरावनी कहानी

भूतिया घर – सच्ची घटना पर आधारित एक डरावनी कहानी

शहर के हाईवे से लगा जंगल फारेस्ट ऑफीसर की मोटरसाइकिल ने पक्की सड़क से की गाँव की पगडंडियों का र्रुख ही किया था , लगभग ३ किलोमीटर आगे जाने पर उसे गाँव के आदिवासी लोगों का जमावड़ा मिला , जो शायद किसी तंत्र मंत्र की साधना या यज्ञ अनुष्ठान कर रहे थे , फारेस्ट ऑफीसर ने एक नज़र दौड़ाई और बाइक आगे बढ़ा दी , फारेस्ट चौकी पर पहुंच कर हॉर्न बजाया चौकीदार ने गेट खोला बाइक चौकी के सामने ग्राउंड में खड़ी करते हुए , फारेस्ट अफसर अपने चौकीदार से पूछता है ये रास्ते में गाँव के लोगों का कैसा जमावड़ा है , चौकीदार जिसका नाम सोहन है बताता है साहेब ये गाँव के आदिवासी लोगों की मान्यता है , बर्षात ख़त्म होते ही पूजा पाठ किया जाता है कहीं हैजा न फैले ,अफसर हँसता हुआ चौकी के अंदर चला जाता है ।

सभी लेबर सामने की नर्सरी में काम कर रहे हैं , दोपहर का १बज चुका था , फारेस्ट अफसर ने सोहन को बोला की दरवाजे पर खटिया बिछा दे थोड़ा आराम करुगा , चौकी में तीन कमरे हैं उनमे तीन दरवाजे हैं तीनो आमने सामने खुलते हैं पीछे वाला दरवाजा जंगल की और खुलता है सामने वाला नर्सरी की और खुलता है , सोहन ने खाट सामने वाले दरवाजे पर बिछा दी , खाट ठीक दरवाजे के बीचो बीच थी , कोई इस पार से उस पार नहीं जा सकता था , फारेस्ट ऑफीसर वहीँ लेट गया जाने कब उसकी आँख लग गयी , सोहन वहीँ सामने पौधों में पानी डाल रहा था , तभी फारेस्ट अफसर को लगा की बहुत सारे बच्चे जंगल की तरफ वाले दरवाजे पर हल्ला मचा रहे हैं , वो उन्हें मना करता हैं बच्चों यहां हल्ला मत करो चलो जाओ यहां से , तभी उस बच्चों के झुण्ड में से एक बच्ची उसकी खाट के सामने आकर खेलने लगती है , और थोड़ी देर बाद चली जाती है , तभी सोहन की एंट्री होती है , वो आते ही पूछता है सो लए साहेब चाय बना दूँ , फारेस्ट ऑफीसर को उस पर गुस्सा आता है , तो तुम ऐसी करते हो चैकीदारी सोहन बोला क्या हुआ साहेब ऑफीसर बोला बताओ कितने बच्चे खेलते हैं यहां पर ये सरकारी नर्सरी है मज़ाक , तुम्हे तो नौकरी से निकाल देना चाहिए , तब सोहन बोला खाना खाने चला गया था न साहेब वो पास वाली नदी में दोपहर भर लोग नहाते हैं उन्ही का हल्ला होता रहा होगा , ऑफीसर बोला सोहन यहां इस चौकी में बच्चे खेल रहे थे ।

सोहन ऑफीसर की बात सटीक जवाब नहीं दे पाया , सोहन चाय बनाकर लाया ऑफीसर चाय पिया और गस्त में पैदल निकल पड़ा , सोहें पीछे पीछे जी साहेब करते चल दिया , फारेस्ट एरिया बहुत बड़ा था सोहन के जैसे बहुत सारे चौकीदार थे उस फारेस्ट में आगे उन्हें एक दूसरा चौकीदार मिला फारेस्ट ऑफीसर ने उसे भी झाड़ा क्या नौटंकी लगा राखी है तुम लोगों ने आज दोपहर में बच्चे खेल रहे थे फारेस्ट चौकी में और ये सोहन जाने कैसे रखवाली करता होगा नर्सरी की भगवान् मालिक है , तभी सोहन तबाक से बोला अरे मई खाना खाँय चले गओं ते तभी दूसरा चौकीदार बोला साहेब आप अकेले रहे न तबै ऐसा भओ, बहुत साल पहले गाँव में हैजा फैलो ते सारा का सारा गाँव साफ़ हो गओ ते , और जो अपना चौकी के पाछे वाला है न सबको वहीँ दफना दीं गा ते । फारेस्ट अफसर पूछता है ओह तब ता ससुरा भूता प्रेत का चक्कर है । सब आगे बढ़ते है आगे एक नदी किनारे एक मूर्ती रखी मिलती है ।

फारेस्ट अफसर चौकी दारों से पूछता है ये कौन हैं , तभी एक लंगड़ा वहाँ पे आता है चौकीदार उसे पाय लागी महराज बोलते हैं , और वो फारेस्ट ऑफीसर को नमस्ते साहेब करके दरख्वास्त लगाता है , साहब एक विनती है हम गाँव के लोग सिद्ध बाबा के भक्त हैं रोज जल चढाने आते हैं , मेरा तो पैर देख ही रहे हैं आप सड़न लिए हुआ है , फारेस्ट ऑफीसर पूछता है के हुआ आपके पाँव को लंगड़ा बताता है ट्रैन से उतरते समय पैर फिसल गओ ते , ता ऊँगली काट गयी तब से सड़न लिए हुयी हैं , ऑफीसर दुःख प्रगट करते हुआ उसकी बात मानने के लिए हामी भरता हुआ आगे बढ़ जाता है , तभी सोहन बोलता है , साहेब या महराज न बदमांश है ससुरा जब नर्सरी सुरु भई ते न तब जौंन गार्ड रहो न ओखी बिटिया के साथ या दुष्कर्म करो रहा , ओहि के फल है ये सड़ा पैर ।

फारेस्ट ऑफीसर पूछता है उस गार्ड का क्या हुआ तब सोहन बताता है बिटिया उसकी इसी चौकी में फांसी में लटक गयी थी बेचारी और गार्ड अपनी बची खुची इज़्ज़त बचा के भाग गओ ते , तब से या नर्सरी बंद रही , अभी तो सुरु हुयी है चार छह साल भओ , फारेस्ट ऑफीसर सोहन को बोल्ट है ये मूर्ति सिद्ध बाबा की ज़मीन में पड़ी नहीं रहनी चाहिए , इसके लिए बेहतरीन सीमेंटेड चबूतरा बनवाओ , तभी इस जंगल से भूत प्रेत का प्रकोप ख़त्म होगा ।

फारेस्ट अफसर आर्डर देकर चला जाता है , दूसरे दिन से नर्सरी में सिद्ध बाबा के लिए चबूतरा बनना सुरु हो जाता है ,अफसर को जो सरकारी बंगला मिला था , वो उस नर्सरी के पास ही था , रात हुयी डिनर के बाद फारेस्ट ऑफीसर के सोने का समय हुआ वो बेड पर सीधा लेता ही था , की उसे एहसास हुआ की कोई छोटा सा बच्चा उसके पेट पर खेल रहा है , वो तुरंत उठा चौकीदार को आवाज़ लगाया , चौकीदार ने बताया एक आदिवासी प्रेग्नेंट महिला इस बंगला में फांसी लगाकर मरी थी , दूसरे दिन तांत्रिक को बुलाया गया और चांदी की तार से बंगले को चारों तरफ से तंत्र मंत्र के साथ बांधा गया ।

इधर नर्सरी में सिद्ध बाबा का शानदार चबूतरा बनकर तैयार हो चुका था उस चबूतरे में अच्छे से प्राणप्रतिष्ठा के साथ सिद्ध बाबा की मूर्ती स्थापित की गयी , सभी गाँव वालों के लिए सिद्ध बाबा का द्वार खोल दिया गया , सब आते उनकी पूजा

करते चले जाते , एक दिन सुबह से ही झमा जहां बारिश हो रही थी वो लंगड़ा महाराज सिद्ध बाबा के दर्शन करने के लिए गया , और नाले में पर छटा वो वही गिर कर मर गया , सोहन ने फारेस्ट अफसर को बताया साहेब सिद्ध बाबा ने इन्साफ कर दओ दुराचारी लंगड़ा महराज उन्ही के दर पर गिर के मर गओ , जब से सिद्ध बाबा की प्राणप्रतिष्ठा हुयी थी तब से नर्सरी की चौकी में भी भूत प्रेत का दिखना बंद हो गया ।